भ्रष्टाचार : सिकल सेल संस्थान के दो कर्मचारी निलंबित, लेकिन पीड़ितों को भटकाने वालों पर कब होगी कार्रवाई, जानिए पूरा मामला

भ्रष्टाचार : सिकल सेल संस्थान के दो कर्मचारी निलंबित, लेकिन पीड़ितों को भटकाने वालों पर कब होगी कार्रवाई, जानिए पूरा मामला रायपुर। छत्तीसगढ़ में सिकल सेल (सिकलिंग) से पीड़ित लोगों की इलाज के लिए सिकल सेल संस्थान की स्थापना की गई है। यहां पीड़ितों का मुफ्त इलाज का दावा किया जाता है, लेकिन सिकलिंग जांच को छोड़कर बाकी इलाज के लिए पीड़ितों को भटकना पड़ता है। सही ढ़ंग से काउंसलिंग नहीं की जाती। संस्थान के कर्मचारी द्वारा जानबूझकर भटकाया जाता है। खैर अभी यह संस्थान खास वजह से सुर्खियों में है।  दरअसल, सिकल सेल संस्था में एक करोड़ रुपए के भुगतान में लापरवाही के कारण दो कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। निलंबन आदेश में लिखा है कि लापरवाही सामने आने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। लेकिन दोनों का जवाब संतुष्ट जनक नहीं पाया गया। इस कारण विभाग ने दोनों को निलंबित कर दिया है। ये पूरा मामला फरवरी 2021 में सिकल सेल संस्थान में हुई एक शिकायत का है। इस मामले में आनंद देव ताम्रकार (स्थापना एवं लेखा शाखा में पदस्थ) और पंकज उपाध्याय (स्टोर कम मेनटेनेंस ऑफिसर) को जांच के बाद निलंबित कर दिया गया है।

जानें पूरा मामला

मिली जानकारी के अनुसार राज्य शासन ने सिकलसेल संस्थान के संचालन के लिए वर्ष 2017-18 से लेकर वर्ष 2021-22 तक एक करोड़ 15 लाख 89 हजार रुपये की राशि दी। इसमें संस्थान द्वारा नियम ताक पर रखकर गार्डन, भवन, एसी मरम्मत, कंप्यूटर, लैब सामान, फर्नीचर, दवाएं व उपकरण खरीदी में भी क्रय नियम की अनदेखी गई है। जब पूरे मामले की विभागीय जांच हुई तो सामने आया कि जहां नियम के तहत एक लाख रुपए से अधिक राशि का कार्य निविदा के आधार पर किया जाता है, वहां विभाग में निविदा नहीं निकाली गई, और कार्य को खंड-खंड में विभाजित करा लिया गया। नियम विरुद्ध खरीदी और भ्रष्टाचार सामने आने के बाद चिकित्सा शिक्षा संचालक ने कार्रवाई के लिए स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिखा है। बाजार मूल्य से अधिक में दवा खरीदी बता दें कि सिकलसेल संस्थान में मल्टीविटामिन गोलियां बाजार मूल्य से अधिक खरीदी के मामले में भी अब तक कार्रवाई अधूरी है। दरअसल कुछ माह पूर्व जीत मेडिकल जनरल स्टोर से मल्टीनेक्स टेबलेट की 40 हजार गोलियां प्रति टेबलेट 1.38 की दर से 55,232 रुपए में खरीदी थी, जबकि एक टेबलेट का खुदरा मूल्य ही 1.20 रुपए है। ओमिप्राजोल (गैस की दवा) की 5,000 ऐसी दवाएं भी खरीद ली गई हैं, जिसे बाजार में विक्रय की अनुमति ही नहीं है।

सीवीसी जांच नहीं होती, प्राइवेट लैब में रेफर

एक पीड़ित ने नाम नहीं छापने की शर्त बताया, प्रदेश में सिकल सेल से पीड़ित लोगों की मदद के लिए संस्थान की स्थापना की गई है। सरकार इस पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। लेकिन यहां पीड़ितों को सही जानकारी नहीं दी जाती। काउंसर से लेकर डॉक्टर गायब रहते हैं। कोई सलाह देने वाला नहीं होता। टोल फ्री नंबर मेंं सीवीसी (CVC-CHORIONIC VILLUS SAMPLING) जांच सुविधा होने की बात कही जाती है, लेकिन कार्यालय में पहुंचने पर साफ इंकार कर दिया जाता है। फिर प्राइवेट लैब रेफर कर दिया जाता है।

संस्थान के परिसर में एनजीओ का प्रचार प्रसार

बकायदा सिकल सेल संस्थान में कोई अपना सा हो, काश फाउंडेशन नाम के एक एनजीओ का पोस्टर छिपा है। जिसमें फ्री में परामर्श की बात लिखी है। लेकिन मौके पर पहुंचने पर एक हजार रुपए फीस ली जाती है। इसके बाद प्राइवेट लैब में रेफर कर दिया जाता है।  [caption id="attachment_18166" align="aligncenter" width="175"] संस्थान में इलाज नहीं, एनजीओ का पोस्टर छिपाकर प्रचार[/caption]

क्यों किया जाता है सीवीसी जांंच

 सवाल उठता है कि आखिर यह जांच क्यों किया जाता है। जब माता और पिता वाहक सिकलिंग ( छोटा सिकलिंग-AS) होता है, ऐसी स्थिति में माता के गर्भवती के दौरान यह जांच करने की सलाह दी जाती है। इससे पता लगाया जाता है कि बच्चों को क्या बीमारी ट्रांसफर हो रहा है या नहीं।