सीएम शिवराज का जादू: भोपाल में भाजपा का कोई विकल्प नहीं, नगर निगम चुनाव में शानदार जीत भोपाल। राजमणि उइके कुछ समय पहले तक निजी कालेज में सहायिका थीं, तो अन्ना नगर में रहने वाली गृहणी अनीता शुक्रवारे का चूल्हा पति प्रमोद की वैन के चलने पर चलता था, ये दोनों अब भाजपा से पार्षद हैं। यह दो नाम केवल उदाहरण हैं, शहर के कई वार्ड के पार्षदों से लेकर महापौर बनी मालती राय की जीत की कहानी भी कम चौंकाने वाली नहीं है। 1994 में 40 वोटों से पार्षद पद का चुनाव हारने वालीं मालती राय आज 98 हजार वोटों के भारी अंतर से जीती हैं। दरअसल नगर निगम के चुनावों में वार्ड से लेकर महापौर पद तक की रेस में भाजपा ने जिस तरह का प्रदर्शन किया है, उसने हर स्तर पर यह दिखाया है कि राजधानी में भाजपा का कोई विकल्प नहीं है। छह जुलाई को शहर में नगरीय निकाय चुनाव के लिए 50 प्रतिशत ही मतदान होने से भाजपा के कर्णधारों के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। मतदाता को बाहर न निकाल पाने पर उच्च स्तर से भी नाराजगी जाहिर की गई थी, ऐसे में रविवार सुबह जब मालती राय मतगणना स्थल पर पहुंचीं तो उनके चेहर पर हल्का तनाव नजर आ रहा था, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना चरण आगे बढ़ते गए, मालती की सहज मुस्कुराहट लौट आई। अंतिम परिणामों को देखें तो भाजपा के 58, कांग्रेस के 22 और पांच निर्दलीय पार्षद निर्वाचित हुए हैं। जबकि 2014 के चुनावों में भाजपा के 56, कांग्रेस के 25 और चार निर्दलीय पार्षद निर्वाचित हुए थे। इस तरह भाजपा दो वार्डों की बढ़त के साथ फायदे में रही है वहीं एक निर्दलीय पार्षद की संख्या भी बढ़ गई। इस तरह यह दोनों पार्षद कांग्रेस के खाते से गए हैं। विभा पटेल का कार्यकाल शहर देख चुका है। न पटेल, न ही उनकी पार्टी से शहर को कोई उम्मीद थी, कुछ पार्षदों ने अपने दम पर किला जरूर लड़ाया, लेकिन इससे पूरी तस्वीर नहीं बदलती। शहर में विकल्पहीनता की स्थिति कांग्रेस की ओर से ही नहीं रही, वहीं उभरती आम आदमी पार्टी ने बराबर का साथ दिया। सिंगरौली पर कब्जा करके प्रदेश में खाता खोलकर फूली नहीं समा रही आप कुछ समय पूर्व तक राजधानी में दखल रखती थी लेकिन नेताओं की आपसी सिर-फुटव्वल ने बना हुआ आधार खिसका दिया। महापौर पद की प्रत्याशी के ऐन मौके पर नाम वापस ले लेने के बाद तो जैसे बिना सेनापति की सेना की तरह आप का विश्वास चकनाचूर हो गया। नतीजा, पार्टी एक पार्षद पद तक हासिल नहीं कर सकी।