महामहिम द्रोपदी मुर्मू महज संयोग नहीं !
आज हमारा देश अपनी आजादी का अमृत उत्सव मना रहा है। यह महज संयोग नहीं है कि इसी वर्ष आदिवासी समाज से द्रोपदी मुर्मू जी देश के राजनीतिक, सैनिक, प्रशासनिक एवं संविधानिक शीर्ष पर विराजमान हो रही हैं। वस्तुतः हमारे आजादी के शिल्पकारों ने, संविधान के रचयिताओं ने जो खुले आंखों सपना देखा था, जनतंत्र के सुंदर स्वरूप की कल्पना की थी, उसी का साकार होना है द्रोपदी मुर्मू !
द्रोपदी मुर्मू का होना यह सिद्ध करता है की हमारी जनतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं। हमारी आस्था कितनी प्रमाणिक एवं हमारा संकल्प कितना दृढ़ है।
आज देश का जनजातीय समाज गर्वित ही नहीं संकल्पित भी हो रहा है, देश के सर्वांगीण विकास में अपना सर्वोच्च योगदान करने के लिए।
पंड़ित दीनदयाल उपाध्याय जी के "अन्त्योदय " की अवधारणा से प्रेरित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में जनजातीय कार्य मंत्रालय का गठन 1999 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के द्वि-विभाजन उपरांत किया था। इसका उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के समेकित सामाजिक-आर्थिक विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित करना है।
प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी जी के यशस्वी नेतृत्व में जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार जनजातियों के चहुमुखी विकास हेतु संकल्पित होकर कार्य कर रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, कौशल विकास, लघु उद्योग, सिंचाई, संचार, तकनीकी सभी दिशाओं में लक्ष्य परक प्रभावी तरीके से कार्य किया जा रहा है। एकलव्य विद्यालयों के माध्यम से जनजाति विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु गुणवत्ता मूलक शिक्षा दी जा रही है। चुनौतियां फिर भी बहुत हैं, किन्तु उनका डटकर सामना किया जा रहा है।
यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक होगा कि जनजाति सभ्यता, संस्कृति एवं विकास एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं । जनजाति समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, रीति रिवाजों को सम्मान देते हुए, उन्हें संजोते हुए भी विकास के किसी भी आयाम को हासिल कर सकता है।
यह औपनिवेशिक सोच कि जनजाति वर्ग जंगलों में रहकर ही अपनी संस्कृति को संरक्षित कर सकता है, बिल्कुल भी प्रामाणिक नहीं है। यह अत्यंत पीड़ादायक सत्य है कि आज भी हमारा जारवा जनजाति (551 जनसंख्या) "जारवा रिजर्व फॉरेस्ट" में संस्कृति रक्षा के नाम पर विकास के आयामों से अछूता है तथा अपने अस्तित्व संकट के दौर से गुजर रहा है।
सेंटलिज समुदाय (50 जनसंख्या) विलुप्त होने के कगार पर है। ऐसा ही, कई जनजाति समुदायों को जिनमें अंडमानिज (56 जनसंख्या), ओंगेज (126 जनसंख्या), शोम्पेन (237 जनसंख्या) शामिल हैं, को जंगलों में जनजाति संस्कृति रक्षा के नाम पर भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का सबसे अच्छा समय आ गया है।
आज जब द्रोपदी मुर्मू जी देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान हो रही हैं तब अब्राहम लिंकन के "जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन” अपने सुंदरतम स्वरूप में हमारे समक्ष है। आइए हम सब भारत के सभी 140 करोड़ लोग, हाँ सभी 140 करोड़ लोग, यह संकल्प लें कि बहुयामी विकास के इस पवित्र राष्ट्र यज्ञ में सबका साथ हो, सबका विश्वास हो एवं सबसे महत्वपूर्ण सबका समुचित प्रयास भी हो।
लेखक- डॉ. दिनेश कुमार झा जनजातीय कार्य राज्य मंत्री जी के अतिरिक्त निजी सचिव भारत सरकार, नई दिल्ली
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