भाटापारा | छत्तीसगढ़ के भाटापारा को पृथक व स्वतंत्र जिला बनाए जाने का मुद्दा अब फिर से गर्म होने लगा है। क्षेत्र की जनता पहले भारतीय जनता पार्टी की सरकार से उम्मीद लगाए बैठी थी परन्तु उस समय सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। वर्ष 2018 प्रदेश में सरकार बदल गई और बागडोर कांग्रेस के हाथ में आ गई, तब से लेकर आज तक क्षेत्र की जनता कांग्रेस सरकार की ओर टकटकी लगाए देख रही है। आज मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भाटापारा दौरे पर पहुंच रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर 35 बरस पुरानी मांग पूरा होने की लोगों में आस जाग गई है। दरअसल, अगले साल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने भी है। इस लिहाज से यह गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। 4 साल पहले इसी विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर सीएम भूपेश बघेल ने भाटापारा को कांग्रेस की सरकार आने पर स्वतंत्र जिला बनाने की बात कही थी तब वे छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। लोकोत्सव मैदान में आयोजित विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर हजारों की संख्या में उपस्थित जनसमूह के मध्य मंच से उन्होंने ऐलान किया था कि कांग्रेस की सरकार आने पर भाटापारा निश्चित रूप से बलौदा बाजार से अलग होकर स्वतंत्र जिला बनेगा। परंतु विडंबना ही है किअपने कार्यकाल के लगभग 4 साल व्यतीत होने के उपरांत भी उन्होंने भाटापारा को जिला का दर्जा नहीं दिया। क्षेत्र की जनता स्थानीय कांग्रेस नेताओं को जरूर सवालों के घेरे में खड़ा करती है तब वे कहते हैं कि मुख्यमंत्री अपना किया हुआ वादा जरुर निभाएंगे, भूपेश हैं तो भरोसा है।
भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही कुठाराघात किया -
क्षेत्र की जनता के साथ विगत 35 वर्षों से दोनों ही दलों के द्वारा कुठाराघात किया जा रहा है। बीते 35 वर्षों से केवल आश्वासन पर यहां की जनता जी रही है। जिले की मजबूत दावेदारी के बाद भी जिले की सौगात यहां की जनता को नहीं मिल पाने से यहां की जनता आहत है। अब जबकि विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आज 18 अगस्त को प्रदेश के मुखिया पुन: भाटापारा आ रहे हैं तब भाटापारा क्षेत्र के निवासियों की आस फिर से जगी है कि मुख्यमंत्री अपना किया हुआ वादा जरुर निभाएंगे और भाटापारा के निवासियों को जिले की सौगात देंगे। इधर जिला निर्माण संघर्ष समिति लगातार कांग्रेसी नेताओं के संपर्क में हैं और भाटापारा को जिला घोषित करवाने के लिए प्रयासरत है। यदि 18 अगस्त को भाटापारा प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री के द्वारा जिले की घोषणा नहीं की जाती है तो संघर्ष समिति पुनः आंदोलन के रास्ते पर अग्रसर होगी।
35 बरस पहले ही जिला बन गया होता-
शासन यदि दुबे आयोग की रिपोर्ट को लागू करती तो 35 साल पहले ही भाटापारा जिला बन गया होता, लेकिन शासन ने दुबे आयोग की रिपोर्ट की अनदेखी की। सरकारें बदलती रही लेकिन इस रिपोर्ट की अनदेखी लगातार होती रही और भाटापारा जिला बनने से वंचित रहा। प्रदेश की सबसे बड़ी नगर पालिका होने के बावजूद भी भाटापारा विकास को तरस रहा है। इसके जिम्मेदार यहां के जनप्रतिनिधि हैं जिन्होंने भाटापारा के साथ कभी न्याय नहीं किया। जिले के नाम पर गेंद को इस पाले से उस पाले में डालना यहां के जनप्रतिनिधियों की नियति बन चुकी है जिसका दंश क्षेत्र की जनता झेल रही है। अब देखना यह है कि आज मुख्यमंत्री अपने वादे को पूरा करते हैं या नहीं।