आरू साहू की सुपरहिट सुआ गीत, लोग कर रहे बेहद पंसद, देखिए वीडियो...
आरू साहू की सुपरहिट सुआ गीत, लोग कर रहे बेहद पंसद, देखिए वीडियो...
रायपुर। दिवाली (देवारी) त्योहार में गांव-शहर में सुआ गीत सुनने को मिल रहा है। इस खास मौके पर छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध बाल गायिका आरू साहू की एक सुआ गीत रिलीज हुई है। जिसके बोल तरी हरी ना ना, मोर ना ना वो सुअना, पीपर के पाना डोलत नई हे। का होगे दिवाना, तइहा बताना वो, मोर पोसे चिरइया बोलत नई हे।
इस गाने को सोमवार शाम को यूट्यूब पर जारी किया गया। जिसे काफी पंसद किया जा रहा है। गाने को 6 घंटे में 66 हजार लोगों ने देख लिया है। आने वाले दिनों में इसे और ज्यादा देखे जाने की उम्मीद है।
देखिए वीडियो-
https://youtu.be/r3vNp7twMPM
आरू साहू के इस सुआ गीत को पहले की तरह ही क्रियटिव विजन ने रिलीज किया है। इसके प्रोड्यूसर दिग्विजय वर्मा है। वहीं गाना दिलीप पटेल ने लिखा है। म्यूजिक मनोज दीवान ने दिया है।
सुआ गीत छत्तीसगढ़ की परंपरा
सुआ गीत नृत्य दिवाली से पहले सुनने को मिलता है। सुआ गीत-नृत्य छत्तीसगढ़ की खास परंपरा है। जो दशहरे के एक दिन बाद से शुरू हो जाता है। महिलाएं टोली बनाकर घर के आंगन में नृत्य करती हैं और बदले में घर वालों से चावल, पैसा, तेल अन्य सामग्री लेती हैं। छत्तीसगढ़ी की आदिवासी महिलाएं लकड़ी की टोकरी में चावल भरकर मिट्टी से बने तोते रखती है। जिसे सुआ कहा जाता है।
दीपावली की रात गौरा-गौरी पूजा
दीपावली की शाम को मां लक्ष्मी की पूजा के बाद रात भर गौरा-गौरी की पूजा होती है। लक्ष्मी पूजा के बाद मिट्टी की मूर्ति बनाई जाती है। महिलाएं रात भर गीत गाती हैं। वहीं, कुश की रस्सी बनाकर पुरुषों के बांह पर प्रहार करती हैं। दूसरे दिन सुबह गौरा-गौरी की मूर्ति को विसर्जन किया जाता है।
देखिए वीडियो...
https://www.youtube.com/watch?v=H5NonD_299Y
धनरेस से दिवाली त्योहार शुरू
छत्तीसगढ़ में दिवाली में साफ-सफाई और घर की सजावट होती है। यहां धनतेरस से अगले पांच दिन तक धूमधाम से त्योहार मनाई जाती है। पर्व का समापन भाई दूज से होता है, लेकिन इससे पहले गोवर्धन पूजा का काफी महत्व रहता है। यादव समाज के लोग उस दिन शाम को शोभायात्रा निकालते हैं, जिसमें शामिल होकर सभी लोग एक-दूसरे को गाय के गोबर का टीका लगाकर बधाई देते हैं।
क्यों गाया जाता है सुआ गीत है (kyon gaaya jaata hai sua geet hai)
विकिपीडिया के मुताबिक, सुआ गीत छत्तीसगढ़ के गोंड महिलाओं का नृत्य गीत है। जिसे अब सभी समाज की महिलाएं गाती है। हिंदी में सुआ का अर्थ 'तोता होता है '। सुआ एक पक्षी होता है जो रटी-रटायी बातों को दोहराता है। इस लोकगीत में स्त्रियां तोते के माध्यम से संदेश देते हुए गीत गाती हैं। इस गीत के जरिए स्त्रियां अपने मन की बात बताती हैं, इस विश्वास के साथ कि वह (सुवा) व्यथा उनके प्रिय तक पहुंचायेगा।
गौरा-गौरी की शादी
धान की की कटाई के समय इस लोकगीत को बड़ी उत्साह के साथ गाया जाता है। इसमें शिव-पार्वती (गौरा-गौरी) का विवाह मनाया जाता है। मिट्टी के गौरा-गौरी बनाकर उसके चारो ओर घुमकर गीत गाकर सुआ नृत्य करते हैं। कुछ जगहों पर मिट्टी के सुआ (तोते) बनाकर यह गीत गाया जाता है। यह दिवाली के कुछ दिन पूर्व आरम्भ होकर दिवाली के दिन शिव-पार्वती (गौरा-गौरी) के विवाह के साथ समाप्त होता है। यह शृंगार प्रधान गीत है। सालों से गाया जा रहा यह गीत मौखिक है। सुआ गीत में महिलाएं बांस की टोकनी मे भरे धान के ऊपर सुआ अर्थात तोते कि प्रतिमा रख देती हैं और उनके चारो ओर वृत्ताकार स्थिति मे नाचती गाती हैं। ये गीत भी मौखिक ही चले आ रहे हैं।
सुआ गीत हमेशा एक ही बोल से शुरु होता है और वह बोल हैं -
तरी नरी नहा नरी नहा नरी ना ना रे सुअना
और गीत के बीच-बीच में ये बोल दुहराई जाती हैं। गीत की गति तालियों के साथ आगे बढ़ती है।
एक सुआ गीत
तरी नरी नहा नरी नहा नरी ना ना रे सुअना
कइसे के बन गे वो ह निरमोही
रे सुअना
कोन बैरी राखे बिलमाय
चोंगी अस झोइला में जर- झर गेंव
रे सुअना
मन के लहर लहराय
देवारी के दिया म बरि-बरि जाहंव
रे सुअना
बाती संग जाहंव लपटाय
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